History of Hidimba Devi Temple कहानी और रोचक तथ्य

By | June 3, 2021

हिडिंबा देवी मंदिर का इतिहास, कहानी और रोचक तथ्य : उत्तर भारत में हिमांचल प्रदेश राज्य मनाली में स्थित हिडिंबा देवी मंदिर एक प्रसिद्ध स्थान है यह मंदिर एक पुरानी गुफा के चारों ओर स्थित है जो महाभारत काल के भीम की पत्नी हिडिंबा को समर्पित है मनाली में कई प्रमुख मंदिर है जिनमें से यह मंदिर वहां का लोकप्रिय मंदिर है इस मंदिर में देवी की कोई प्रतिमा नहीं पाई जाती, बल्कि उनके पद चिन्हों की पूजा अर्चना की जाती है यह मंदिर जंगल के बीचो बीच स्थित है इसेडूंगरी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है

हिडिंबा देवी मंदिर का इतिहास :

डूंगरी शहर के पास देवदार के जंगलों में इस मंदिर का निर्माण किया गया, जो कि हिमालय पर्वत की कगार पर स्थित है कहा जाता है कि इस मंदिर के निर्माण की वजह हिडिंबा की तपस्या रही यह भी कहा जाता है कि हिडिंबा ने अपने  पुत्र के बड़े होने पर उसे अपना सिंहासन शौप दिया और स्वयं तपस्या करने के लिए जंगल चल गई वहां पर उन्होंने एक चट्टान पर बैठकर तपस्या करी कई वर्षों तक तपस्या करने के बाद उन्हें देवी होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ उसी चट्टान के ऊपर राजा बहादुर सिंह ने हिडिंबा देवी की यादगार में सन 1553 ईस्वी में इस मंदिर का निर्माण कार्य करवाया और उसके पश्चात धीरे-धीरे यह मंदिर श्रद्धा और मनोरंजन का पर्यटन स्थल हुआ

हिडिंबा देवी की कहानी :

हिडिंबा एक राक्षसी थी, जो अपने भाई के साथ इस क्षेत्र में निवास करती थी किसी कारण वश उसने यह प्रतिज्ञा ली थी कि जो भी उसके भाई से युद्ध में जीतेगा वह उससे विवाह करेंगी एक समय पांचो पांडव अपना वनवास काल काटने के लिए उस क्षेत्र में पहुंचे हिडिंबा के भाई ने वहां के वासियों को अपने अत्याचारों से परेशान कर रखा था, इस वजह से कानों के दूसरे भाई भीमसेन ने हिडिंबा के भाई हिडिंब का वध किया, और उसकी बहन हिडिंबा से विवाह भी किया भीम और हिडिंबा को एक पुत्र भी हुआ, जिसका नाम घटोत्कच रखा गया जो कि कुरुक्षेत्र के युद्ध में अपने पिता की तरफ से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ

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हिडिंबा मंदिर के बारे में कुछ रोचक तथ्य :

  • पगोडा शैली में इस मंदिर का निर्माण होने के कारण यह मंदिर अपनी एक अलग पहचान बनाता है
  • किस मंदिर का निर्माण लकड़ी से हुआ है मंदिर चार छतों से मिलकर बना है इसकी सबसे नीचे वाली छत पीतल और तांबे से बनी हुई है बाकी की 3 शब्दों का निर्माण देवदार की लकड़ी के तख्तों से हुआ है
  • दूर से देखने पर इस मंदिर का नजारा कलश के आकार का दिखाई देता है इस मंदिर की ऊंचाई 40 मीटर की है, मंदिर की दीवारों पर सुंदर नक्काशी की गई है जो कि पत्थर की बनी है
  • मंदिर के चौखट की बीम पर भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी कई प्रतिमाओं की पेंटिंग की गई है, और मंदिर में एक लकड़ी का दरवाजा भी है जिस पर देवी के साथ-साथ कई जानवरों की पेंटिंग देखने को मिलती है
  • मंदिर में देवी की कोई भी प्रतिमा नहीं है बल्कि देवी गीत पद चिन्हों पर रखें एक बड़े से पत्थर की पूजा आराधना की जाती है
  • मंदिर से 70 मीटर की दूरी पर देवी के पुत्र घटोत्कच का मंदिर है

हिडिंबा देवी के मंदिर में पूजा का समय :

वैसे तो यह मंदिर साल के 365 दिन खुला ही रहता है , लेकिन यहां पर पूजा करने का कुछ समय निश्चित किया गया है, जैसे कि मंदिर सुबह 8:00 बजे खुलता है और शाम 6:00 बजे बंद हो जाता है इस मंदिर में आने जाने वाले श्रद्धालुओं पर किसी भी प्रकार की कोई पाबंदी नहीं लगाई जाती, न ही देवी से जुड़ी किसी भी चीज की फोटो लेने की मनाही है

हिडिंबा देवी के मंदिर में पहुंचने का तरीका :

मंदिर में श्रद्धालु हवाई यात्रा, ट्रेन यात्रा अथवा बस के द्वारा भी पहुंच सकते हैं हिडिंबा देवी के मंदिर के समीप ही कुल्लू नाम का हवाई अड्डा है, जो मनाली से 10 किलोमीटर की दूरी पर है हवाई अड्डे से किसी ऑटो या रिक्शा की सहायता से मंदिर तक पहुंचा जा सकता है क्योंकि देवी का यह मंदिर जंगल के बीचो-बीच मनाली से 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है

हिडिंबा देवी के मंदिर का महोत्सव :

यहां के लोग हर वर्ष सावन के महीने में एक उत्सव का आयोजन करते हैं, जो राजा बहादुर सिंह की याद में मनाया जाता है क्योंकि उन्होंने ही इस मंदिर का निर्माण करवाया था इसीलिए यहां के निवासियों ने इस मेले का नाम बहादुर सिंह रे जातर रखा यहां के निवासी 14 मई को हिडिंबा देवी के जन्मदिन के रूप में भी एक उत्सव मनाते हैं, जिस उत्सव में यहां की महिलाएं गीत,  संगीत और नृत्य करके जश्न मनाती हैं

सावन के महीने में आयोजित इस मेले को सरोहनी मेले के नाम से भी जाना जाता है यहां के लोगों द्वारा बताया जाता है कि यह मंदिर लगभग 500 साल पुराना है इसके अलावा इस मंदिर में नवरात्र के पावन अवसर पर भी कई तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिसमें दशहरे का पर्व बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, जिसे देखने के लिए स्थानीय लोगों के अलावा दूर-दूर से यात्री आते हैं